इतना तो करना स्वामी जब प्रण तन से निकले
गोविंदा नाम लेके तब प्रण तन से निकले
श्री गंगाजी का तट हो यमुना का वंशीवट हो
मेरा संवारा निकट हो जब प्रण तन से निकले
पीताम्बरी कासी हो छवि मन में ये बसी हो
होंठों पे कुछ हसी हो जब प्रण तन से निकले
जब कंट प्रण ए कोई रोग न सताए
यामा दरस न दिखाए जब प्रण तन से निकले
उस वक्त जल्दी आना नहीं स्याम भुल जाना
राधे को साथ लाना जब प्रण तन से निकले
एक भक्त की हैं अर्जी खुदगर्ज़ की हैं गरजी
आगे तुम्हारी मर्ज़ी जब प्रण तन से निकले
इतना तो करना स्वामी जब प्रण तन से निकले
गोविंदा नाम लेके तब प्रण तन से निकले
श्री गंगाजी का तट हो यमुना का वंशीवट हो
मेरा संवारा निकट हो जब प्रण तन से निकले
पीताम्बरी कासी हो छवि मन में ये बसी हो
होंठों पे कुछ हसी हो जब प्रण तन से निकले
जब कंट प्रण ए कोई रोग न सताए
यामा दरस न दिखाए जब प्रण तन से निकले
उस वक्त जल्दी आना नहीं स्याम भुल जाना
राधे को साथ लाना जब प्रण तन से निकले
एक भक्त की हैं अर्जी खुदगर्ज़ की हैं गरजी
आगे तुम्हारी मर्ज़ी जब प्रण तन से निकले
इतना तो करना स्वामी जब प्रण तन से निकले
- Author Unknown

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